June 16, 2021

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क्या सियासत को गन्दगी से पाक करना अहले-इल्म की ज़िम्मेदारी नहीं?

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ये सही वक़्त है जब आप अपनी क़ौम, भारत के मज़लूम और महरूम तबक़ों की आवाज़ बन सकते हैं

कलीमुल हफ़ीज़

पिछले दिनों जब मुझे ऑल इंडिया मजलिसे इत्तिहादुल मुस्लेमीन (AIMIM) दिल्ली की ज़िम्मेदारी दी गई और मेरे दोस्तों को मालूम हुआ तो मुझे अलग-अलग तबसिरे और रिएक्शन मिले। जहाँ कुछ दोस्तों ने मेरा हौसला बढ़ाया और मेरे फ़ैसले को दुरुस्त कहा तो वहीँ एक बड़ी तादाद ने इस फ़ैसले को मेरी नादानी, नासमझी और हिमाक़त समझा। उनकी दलील थी कि सियासत एक गन्दा खेल है। यहाँ रह कर इंसान मुनाफ़िक़त की रविश इख़्तियार कर लेता है। ये अच्छे और पढ़े-लिखे, कारोबारी लोगों का काम हरगिज़ नहीं है।
मेरे इन मोहसिनों और शुभ-चिन्तकों में एक तब्क़ा वो भी था जो मेरे राजनीति में आने को तो किसी तरह गवारा कर रहा था लेकिन उसे मेरी राजनीतिक पार्टी पर ऐतराज़ था। उसके नज़दीक मैं एक कम्युनल पार्टी में शामिल हो गया हूँ। उनकी राय ये भी थी कि मेरे इस क़दम से साम्प्रदायिक पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी को फ़ायदा पहुँचेगा। बहरहाल ये सब मेरे अपने थे और मेरे ही शुभचिन्तक थे जो मुझे मशवरे दे रहे थे, मैं इन सब का शुक्रिया अदा करता हूँ।

राजनीति के बारे में ये बात हमारे दीनी तबक़े में बहुत होती है कि सियासत गन्दी चीज़ है। हमारे आलिमों की एक बड़ी संख्या अपनी कथनी और करनी से ये साबित करती रही है कि ये काम नेक लोगों को शोभा नहीं देता, इससे दूर ही रहना चाहिए। कभी जब इनसे कहा जाता है कि चारों ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन ने भी हुकूमत और इक़्तिदार की ज़िम्मेदारियाँ अंजाम दी हैं। तो इसपर उनका जवाब होता है कि वो ज़माना और था, वो पाकीज़ा दौर था, अब ज़माना ख़राब है। अब सियासत और हुकूमत व इक़्तिदार का मैदान इस क़ाबिल नहीं रहा कि इसमें क़दम रखा जाए।
मैं सोचता हूँ कि ये वही सोच और फ़िक्र है जिसने हमें इक़्तिदार से बेदख़ल किया और उसे इब्लीस के हाथों में सौंप दिया। शायद ये हुआ होगा कि मुस्लिम दौरे-हुकूमत में कोई पार्टी सिस्टम तो था नहीं, ख़ानदानी हुकूमतें थीं, इनके आपस में ही इक़्तिदार की जंग थी, जनता को इससे कोई सरोकार नहीं था। जनता को अपना बादशाह चुनने का इख़्तियार ही नहीं था। इसलिये मुसलमानों में सियासत का मौजूदा जम्हूरी और इंतिख़ाबी तसव्वुर पैदा ही नहीं हुआ। एक लम्बे समय तक आलिम दर्स व तदरीस और बयान वग़ैरा के ज़रिए ही इस्लाह व सुधार के काम में लगे रहे। वे अपनी ख़ानक़ाहों में अपने मुरीदों की तरबियत करते रहे, आम जनता हो या ख़ास लोग उनसे ज़रूरत भर ही बात करते और उनसे फ़ायदा उठाते रहे, इसलिये आज़ादी के बाद भी वो इससे दूर ही रहे।
आलिम न सिर्फ़ इससे दूर ही रहे बल्कि उन्होंने मुसलमानों को भी इसे दुनियादारी का अमल कह कर इससे दूर कर दिया, धीरे-धीरे मुसलमानों की नुमाइंदगी इक़्तिदार में कम होती गई और उम्मत बेअसर हो गई। जिसके अंजाम के तौर पर आज हम अपना सब कुछ लुटा हुआ अपनी आखों से देख रहे हैं।
दूसरी बात ये हुई कि जो मुसलमान उम्मत की नुमाइंदगी करने उठे वो उम्मत की फ़िक्र से कोसों दूर थे, उन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी कुर्सी बचाने की फ़िक्र थी, उनके नज़दीक पार्टी का फ़ायदा उम्मत के फ़ायदों से ज़्यादा प्यारा था, उनके लब पार्टी व्हिप के पाबन्द थे। इसके नतीजे के तौर पर भी हम अपनी बेअसरी और तबाही देख रहे हैं।

इन हालात में मुस्लिम दानिश्वरों की ज़िम्मेदारी क्या सिर्फ़ यही है कि वो अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर दर्द पर तबसिरे करते रहें, कॉलेज के प्रोफ़ेसर, अस्पताल के डॉक्टर्स, अदालतों के जज और वकील, मुस्लिम जमाअतों के अमीर और मुशीर, अहले-क़लम और अहले-इल्म तमाशा देखनेवाले बन कर रह जाएँ और नत्थु, जुम्मन और कल्लन इक़्तिदार के गलियारों को गन्दा करते रहें। आख़िर हमारा अहले-इल्म और समझदार तब्क़ा जो अपने क़लम की सियाही से भारत के मुसलमानों के हाल और मुस्तक़बिल पर कॉलम लिख-लिख कर काग़ज़ के दफ़्तर स्याह कर रहा है वो ख़ुद सियासत के मैदान में क्यों नहीं उतर जाता।
क्या कभी किसी गन्दे नाले की गन्दगी उसमें उतरे बग़ैर भी साफ़ हुई है? अगर इसके लिए सफ़ाई कर्मियों को उसमें उतरना पड़ता है तो हुकूमत और इक़्तिदार की गन्दगी को साफ़ करने के लिये आप क्यों नहीं उतरते? बराए-करम ये भी फ़रमा दीजिये कि कब तक नहीं उतरेंगे? पर्सनल लॉ ख़त्म हुआ, मस्जिदें छिन गईं, अज़ानें नागवार लगने लगीं, दस्तरख़ान पर पाबन्दियाँ लग गईं, सरे-आम पीटे जाने लगे, खुले आम इज़्ज़त व इस्मत तार-तार करने की धमकियाँ दी जाने लगीं, पगड़ियाँ उछाली जाने लगीं, क्या अभी कुछ और खोना बाक़ी रह गया है?
रही ये बात कि मुसलमान अपनी सियासी पार्टी में शामिल न हो, बल्कि तथाकथित सेक्युलर पार्टियों का ही हिस्सा बना रहे, ख़ामोश रहे, क्योंकि उसके इस क़दम से भी साम्प्रदायिक ताक़तों को फ़ायदा होगा और सेक्युलर पार्टियाँ कमज़ोर होंगी, क्या हमें अपनी इस बात पर ग़ौर करने का वक़्त नहीं आ गया है?
क्या बी-जे-पी को रोकने की हमने तमाम कोशिशें करके नहीं देख ली हैं? क्या वो दिन हमें याद नहीं जब मुस्लिम लीडर्स ने हुक्म दिया कि वो बी-जे-पी को हराने वाली पार्टी के उम्मीदवार को वोट देकर कामयाब करें। क्या हश्र हुआ हमारी इस प्लानिंग का सिवाए इसके कि “मर्ज़ बढ़ता गया जुं जुं दवा की”। आज बी-जे-पी पूरी शान व शौकत के साथ जलवा फ़रमा है।
इसके बजाए जहाँ मुस्लिम राजनीतिक पार्टियों ने सीधे-सीधे अपने जम्हूरी हक़ का इस्तेमाल करते हुए चुनावों में हिस्सा लिया वहाँ मुसलमान भी मज़बूत हुए, उसके हुक़ूक़ भी महफ़ूज़ रहे, साम्प्रदायिक ताक़तों को इक़्तिदार तक पहुँचने में दुश्वारी भी हुई। केरल और तिलंगाना इसकी बहुत नुमायाँ मिसालें हैं। दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश है जहाँ नाम-निहाद सेक्युलरिस्टों की मौजूदगी बल्कि गठबंधन के बावजूद महाराज का राज है। इसलिए ये सोच मुनासिब नहीं है कि हमारी अपनी लीडरशिप से किसी का फ़ायदा और किसी का नुक़सान हो जाएगा।
मेरा मानना है कि मुस्लिम सियासत से चाहे कांग्रेस कमज़ोर हो या बे-जे-पी मज़बूत, मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, बल्कि मुझे ये सोचना है कि भारत के मुसलमानों का भला किसमें है।
मेरा मानना है कि इस गूँगी उम्मत को अपनी ज़बान चाहिये, इसने दूसरों की भलाई में अपना सब कुछ लुटा दिया है, इसने अपने जवान बच्चों की लाशें अपने कन्धों पर उठाई हैं, इसने मलयाना, हाशिमपुरा, नीली, भागलपुर, गुजरात, मुज़फ़्फ़रनगर और हालिया दिल्ली में ख़ून से लथपथ मंज़र देखे हैं। इसने देखा है कि किस तरह मकानों से धुआं उठता है? इसने सब को आज़मा लिया है। अब कोई नहीं बचा है?
इसको न लालू से कुछ मिला है, न मुलायम और माया से। इसलिये इसे राहुल, ममता और केजरीवाल से भी उम्मीद नहीं रखनी चाहिये। ये तथाकथित सेक्युलरिज़्म के ठेकेदार भी आपको उसी वक़्त कुछ दे सकते हैं जब आप एक सियासी क़ुव्वत बन कर उनसे लेने की पोज़ीशन में हों।
मैं मिल्लत के तमाम दर्दमन्दों को आवाज़ देता हूँ कि ये सही वक़्त है जब आप अपनी क़ौम की, भारत के मज़लूम और महरूम तबक़ों की आवाज़ बन सकते हैं, ये देश बचाने का वक़्त है। ये आपका क़ानूनी और जम्हूरी हक़ है, संविधान में हर भारतवासी को अपनी सियासी पार्टी बनाने का अधिकार है और इसपर अमल करते हुए चार, पाँच प्रतिशत आबादी वालों ने अपनी पार्टी बना ली है। आप 15 फ़ीसद हो कर भी इस तरफ़ तवज्जोह नहीं दे रहे हैं।
इससे पहले कि ये हक़ छिन जाए इसका इस्तेमाल कीजिये। अपनी सियासी पार्टी बनाना क़ौमपरस्ती या साम्प्रदायिकता नहीं है। किसी का नुक़सान किये बग़ैर अपनी क़ौम की बात करना साम्प्रदायिकता नहीं है बल्कि साम्प्रदायिकता तो ये है कि बाक़ी सबका नुकसान करके अपनी क़ौम का भला चाहा जाए। अपने हिस्से का काम कीजिये, आइये अपनी नस्लों को एक मज़बूत भारत देने के लिए अपनी महफ़ूज़ पनाहगाहों से निकलिये।

कलीमुल हफ़ीज़- नई दिल्ली

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